इन्द्र विद्या वाचस्पति तिवारी

भारत वर्ष में अनेक त्योहार मनाये जाते हैं जिनमें होली, दिवाली, के साथ ही उत्तर भारत में प्रसिद्ध है छठ का त्योहार जिसे प्रवासी भी मनाते हैं।


भारतीय त्योहारों छठ पर्व का अपना रंग और महत्व है इसदिन औरतों और पुरूषों की भारी तादाद नदी और तालाबों पोखरों तथा कृत्रिम नालियों के सामने अपना अपना दौरा सजाये सायंकाल और दूसरे दिन प्रातःकाल अपनी-अपनी वेदियों के सामने बैठते हैं कोई-कोई तो कमर भर पानी में खड़े रहतें हैं। यह मूलतः औरतों में विख्यात है और बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र के निवासी जिस-जिस क्षेत्र में या देश में गये हैं वहां भी यह मनाया जाता है। यह पूरे भारत वर्ष में बिहारी त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है।
इसछठ के एक दिनपूर्व औरत या व्रती भोजन करता है जिसमें लौकी की सब्जी(तरकारी)की अनिवार्यता रहती है। छठ के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रहता है सायंकाल का अर्घ चंद्रमा को तथा दूसरे दिन प्रातःकाल का अर्घ सूर्य देव को देने के बाद ही घर आकर पारण करता है।
छठ केे लिए सरकार की तरफ से अनेक सुविधायें प्रदान की जाती हैं । जैसे त्योहार के लिए बाहरी व्यक्तियों को घर लाने के लिए रेल गाडि़या स्पेशल चलाई जाती हैं ं ।छठ पूजन के स्थान पर की व्यवस्था के लिए पुलिस बल की व्यवस्था की जाती है। छठ व्रतियों के आने जाने केे लिए निर्धारित मार्गों पर प्रकाश की व्यवस्था स्थानीय कमेटियों के द्वारा भी की जाती है। नदियों में स्नान के समय के लिए कहीं-कहीं जलपुलिस भी लगाई जाती है।
छठ पर्व के अवसर पर फल जैसे केला, सेव, शरीफा, अमलताश, के साथ ही हल्दी का सुदा पौधा, गन्ना को सूर्य देव के सामने चढाया जाता है । इसके साथ ही मीठी पूड़ी(पूआ),ठेकुआ इत्यादि भोग लगाया जाता है। द ीप चलाया जाता है। हल्दी आटे का लेप लगाया जाता है।
इसकी विशेषता यह है कि इसकी मान्यता आप मानते है कि मेरा अमुक कार्यहो हो जाय तो अक्सर पाया जाता है िकवह कार्य हो जाता है ं ं।इसलिए बहुतायत में लोग इस पर्व को मनाते हैं कोई शायद ही ऐसा घर हो जहां पर छठ का पर्व नहीं मनाया जाता है।
विशेष बात है कि पूजा चंद्रमा की भी की जाती है सांयकाल का अर्घ चंद्रमा को ही दिया जाता है लेकिन मान्यता है कि इसे सूर्य षष्ठी कहा जाता हैं। ध्यातब्य है कि इसे अनोखे नाम छठी मइया से भी जाना जाता है।

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