बलिवेदी का पत्थर

बलिवेदी का पत्थर

मैं बलिवेदी का पत्थर देख रहा इस राह को 
और सेंक रहा उस चाह को 
सुनसान सी दिखती यह सड़क 
कभी गुलज़ार थी पर आज सुनसान है |
इसी सुनसान सड़क की राहों से 
गुज़रते पथिक देखते हैं इस ओर 
पर बढ़ जाते हैं आगे अपने रस्ते 
और मैं वहीँ ठिठका रह जाता हूँ |
सुनता हूँ , देखता हूँ सब कुछ समझता हूँ ,
पर कुछ कह नहीं पाता हूँ |
कभी कभी कोई कदम बढ़ाता है 
फिर उदासीनता से आगे बढ़ जाता है |
और मैं वहीँ निश्चल
ठहरा, अचल और अटल |
बैठा रहता हूँ किसी अन्य पथिक की राह में ,
कभी तो कुछ यात्री मेरी राह में आते हैं 
पर स्वयं की जगह औरों का रक्त बहाते हैं |
उनकी उस दृष्टि में स्वार्थ होता है 
मेरा प्रस्तर का ह्रदय अक्सर ही रोता है |
कभी मुझे रंगने वालों की कतारें थी 
रक्त वर्ण शोभित कई दीवारें थी |
प्रतीक्षा में हूँ की कोई तो आगे आएगा 
इस बलिवेदी पर कौन रक्त बहायेगा |
पर आज की निष्ठुरता देख कुछ कह नहीं पाता हूँ 
सुनता देखता बस चुप रह जाता हूँ |

-‪#‎विकास_भांती‬

The End

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