ख्वाहिशें

ख्वाहिशों का क्या वो तो उड़ानें भरती हैं,
हकीकतें हमें हर तरफ़ से जकड़ती हैं,
ज़िंदगी की कश्मकश कि खासियत है यही,
कि दोनों के बीच अपनी नाव चलानी है।

ख्वाहिशों की लगाम है अपने हाथों में जिस तरह,
कश्ती की पतवार भी है अपने हाथों में उसी तरह,
कला है दोनों में सामंजस बैठाना हरदम,
आकांक्शाएं करें विचलित भले ही मन ।

ख्वाहिशों का क्या वोह तो उड़ती रहेंगी,
नियत कर्म यही है उनका निर्धारित,
मन और धर्म दोनों हैं आप पर निर्भर,
उड़ायें पतंग बेबाक अपने ही चमन में,
होड़ न करें ज़माने की उड़ान की,
जो हवाओं के साथ बदलती रहेगी,

दिशायें हवाओं की बदलती रहीं हैं अक्सर,
जो थे कल सम्राट, हैं आज ज़माने के कायल,
वक्त कब किसका रहा एक समान, उसकी तो चाल हर पल निराली है ।

जीवन रूपी नॉव है हम पर ही निर्भर,
दिशा, गति ओर भाव हमें ही देना है,
हम ही हैं उस नॉव के पतवार और माझी,
ख्वाहिशों को आकार हमें ही देना है ।
जीवन को आकार हमें ही देना है ।

The End

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